संदेश

समुद्र का पानी। dink

बहुत दूर पर अट्टहास कर सागर हँसता है। दशन फेन के, अधर व्योम के। ऐसे में सुन्दरी ! बेचने तू क्या निकली है, अस्त-व्यस्त, झेलती हवाओं के झकोर सुकुमार वक्ष के फूलों पर ? सरकार ! और कुछ नहीं, बेचती हूँ समुद्र का पानी। तेरे तन की श्यामता नील दर्पण-सी है, श्यामे ! तूने शोणित में है क्या मिला लिया ? सरकार ! और कुछ नहीं, रक्त में है समुद्र का पानी। माँ ! ये तो खारे आँसू हैं, ये तुझको मिले कहाँ से ?n
कहां रहेगी चिड़िया ? आंधी आई जोर-शोर से डाली टूटी है झकोर से उड़ा घोंसला बेचारी का किससे अपनी बात कहेगी अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ? घर में पेड़ कहाँ से लाएँ कैसे यह घोंसला बनाएँ कैसे फूटे अंडे जोड़ें किससे यह सब बात कहेगी अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी ?

ओसsld

हरी घास पर बिखेर दी हैं ये किसने मोती की लड़‍ियाँ? कौन रात में गूँथ गया है ये उज्‍ज्‍वल हीरों की करियाँ? जुगनू से जगमग जगमग ये कौन चमकते हैं यों चमचम? नभ के नन्‍हें तारों से ये कौन दमकते हैं यों दमदम? लुटा गया है कौन जौहरी अपने घर का भरा खजा़ना? पत्‍तों पर, फूलों पर, पगपग बिखरे हुए रतन हैं नाना। बड़े सवेरे मना रहा है कौन खुशी में यह दीवाली? वन उपवन में जला दी है किसने दीपावली निराली? जी होता, इन ओस कणों को अंजली में भर घर ले आऊँ? इनकी शोभा निरख निरख कर इन पर कविता एक बनाऊँ।

प्रकृति संदेश sld

पर्वत कहता शीश उठाकर, तुम भी ऊँचे बन जाओ। सागर कहता है लहराकर, मन में गहराई लाओ। समझ रहे हो क्या कहती हैं उठ उठ गिर गिर तरल तरंग भर लो भर लो अपने दिल में मीठी मीठी मृदुल उमंग! पृथ्वी कहती धैर्य न छोड़ो कितना ही हो सिर पर भार, नभ कहता है फैलो इतना ढक लो तुम सारा संसार!

हरी हरी दूब परabb

हरी हरी दूब पर ओस की बूंदे अभी थी, अभी नहीं हैं| ऐसी खुशियाँ जो हमेशा हमारा साथ दें कभी नहीं थी, कहीं नहीं हैं| क्काँयर की कोख से फूटा बाल सूर्य, जब पूरब की गोद में पाँव फैलाने लगा, तो मेरी बगीची का पत्ता-पत्ता जगमगाने लगा, मैं उगते सूर्य को नमस्कार करूँ या उसके ताप से भाप बनी, ओस की बुँदों को ढूंढूँ? सूर्य एक सत्य है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता मगर ओस भी तो एक सच्चाई है यह बात अलग है कि ओस क्षणिक है क्यों न मैं क्षण क्षण को जिऊँ? कण-कण मेँ बिखरे सौन्दर्य को पिऊँ? सूर्य तो फिर भी उगेगा, धूप तो फिर भी खिलेगी, लेकिन मेरी बगीची की हरी-हरी दूब पर, ओस की बूंद हर मौसम में नहीं मिलेगी|

लहर सागर का नहीं श्रृंगारhb

लहर सागर का नहीं श्रृंगार, उसकी विकलता है; अनिल अम्बर का नहीं खिलवार उसकी विकलता है; विविध रूपों में हुआ साकार, रंगो में सुरंजित, मृत्तिका का यह नहीं संसार, उसकी विकलता है। गन्ध कलिका का नहीं उदगार, उसकी विकलता है; फूल मधुवन का नहीं गलहार, उसकी विकलता है; कोकिला का कौन सा व्यवहार, ऋतुपति को न भाया? कूक कोयल की नहीं मनुहार, उसकी विकलता है। गान गायक का नहीं व्यापार, उसकी विकलता है; राग वीणा की नहीं झंकार, उसकी विकलता है; भावनाओं का मधुर आधार सांसो से विनिर्मित, गीत कवि-उर का नहीं उपहार, उसकी विकलता है।

दिन जल्दी-जल्दी ढलता हैhb

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है! हो जाए न पथ में रात कहीं, मंजिल भी तो है दूर नहीं- यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है! दिन जल्दी-जल्दी ढलता है! बच्चे प्रत्याशा में होंगे, नीड़ों से झाँक रहे होंगे-- यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है! दिन जल्दी-जल्दी ढलता है! मुझसे मिलने को कौन विकल? मैं होऊँ किसके हित चंचल?-- यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है! दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!